Advertisement

header ads

यौन इच्छा को कैसे नियंत्रित करे | काम इच्छा पर विजय | स्वास्थ्य पत्रिका

शास्त्रों के अनुसार यौन इच्छा को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?How to control sexual desire

शास्त्रों में मनुष्य के लिये चार पुरुषार्थ बताये गये हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। काम का तीसरा स्थान है । सुन्दर, सुख तनाव मुक्त और प्रेरणादायक जीवन जीने के लिये धर्म के अनुकूल आचरण के साथ धर्म अनुकूल अर्थ अर्जन करते हुये धर्म के अनुसार काम की वैधता शास्त्रों ने प्रदान की है।

काम का अनेक अर्थ है। मनुष्य की इच्छायें, तृष्णायें, कामनायें तथा वासनायें, सभी काम के अन्तर्गत आती हैं। यहाँ पर हम केवल स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध मतलब यौनाचार से सम्बन्धित काम वासना, काम कला अथवा कामसूत्र पर संक्षिप्त उल्लेख करेंगे। 

यौन इच्छा को कैसे नियंत्रित करें

विपरीत योनि (स्त्री पुरुष के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है। इसका ज्ञान या प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है l उम्र के साथ जैसे जैसे स्त्री पुरुष रूप, रस, गंध और स्पर्श के सम्पर्क में आते हैं, मौसम अपने अंक में बिठाकर काम राग सुनाने लगती हैं, कामदेव पुष्प शर से व्यक्ति की कामेच्छा को जगाते हैं, पशु-पक्षी सेक्स करते हैं l 

मनुष्यों में काम की इच्छा पैदा करते हैं, सेक्स के बारे में सोचना,  लड़का लड़की के प्रति तड़प, सेक्स करने की इच्छा (सहवास), आलिंगन, स्वप्न में सेक्स करना आदि विभिन्न परिस्थितियाँ मनुष्य में सेक्स उत्पन्न करती हैं।

परमात्मा ने मनुष्यों को मैथुनी सृष्टि रचने का दायित्व दिया है। मैथुन में शारीरिक मिलन, संघर्षण और सहवास में लिप्तता, रति क्रिया में पराकाष्ठा, निमग्नता के साथ स्त्री-पुरुष में मानसिक व आत्मिक एकात्मभाव, और समर्पण अनिवार्य है। 

संतान उत्पत्ति के लिये गर्भाधान संस्कार है जिसका अर्थ है संतान उत्पत्ति की इच्छा हो, तब स्त्री-पुरुष परस्पर विचार कर ऋतुकाल का विचार कर यौन सम्बन्ध बनाये l यहाँ तक कहा गया है कि सम्भोग की अवस्था में पुरुष व स्त्री आँख में ऑँख डालकर सेक्स करें, जिससे संतान में माता-पिता दोनों के गुण पहुँच सकें। काम-क्रीड़ा के समय पति-पत्नी एक-दूसरे के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी के बारे में न सोचें व ध्यान नहीं करें।


श्रीकृष्ण ने संतानोत्पत्ति के लिये रुक्मिणी के साथ 12 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत 

भगवान श्रीकृष्ण ने संतानोत्पत्ति के लिये रुक्मिणी के साथ 12 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। सम्भोग का प्रयोजन संतानोत्पत्ति है, शारीरिक भूख की शान्ति अथवा क्षणिक सुख हेतु वीर्य का नाश नहीं। रति क्रीड़ा हेतु स्वस्थ तन तथा स्वस्थ मन दोनों का होना अनिवार्य हैं और साथ ही पवित्र उद्देश्य भी। यदि इस तथ्य को समझ लिया जाये, स्वीकार कर लिया जाये, तो काम वासना पर विजय पायी जा सकती है l साथ ही बलात्कार, यौन उत्पीड़न तथा यौन शोषण स्वयं ही  समाप्त हो जायेगा इस वृत्ति को पैदा करने के लिये संस्कारोन्मुख शिक्षा आवश्यक है।

श्री कृष्ण से जाने कामेच्छा पर नियंत्रण

आजकल की संस्कृति के प्रभाव में युवक-युवती ही नहीं वृद्ध स्त्री पुरुष भी खुली यौनाचार संस्कृति के पक्षधर होते जा रहे हैं। लड़का लड़की एक साथ शिक्षा, परिवारों में माता-पिता का यौनजन्य, खुला आचरण, क्लब संस्कृति, सोशल मीडिया प्रणाली, बोलचल की भाषा का चलन, वेशभूषा का चलन, यूट्यूब, यौनाचार के कृत्रिम साधन, बॉलीवुड फ़िल्म इंडस्ट्री, युवक-युवतियों में खुला यौन का वातावरण पैदा कर रहे हैं। परिणामतः विवाह के बाद संतानोत्पत्ति हेतु संचित की जाने वाली वीर्य शक्ति, ऊर्जा, स्वस्थ चिन्तन आदि विवाह से पूर्व ही नष्ट हो जाता है और युवा पीढ़ी विभिन्न यौन रोगों (नपुंसकता, शीघ्रपतन आदि) से ग्रसित हो जाती है।

काम वासना एक स्वाभाविक मानसिक व शारीरिक प्रक्रिया है। शरीर में संचित शक्ति (ओज, तेज, वीर्य) स्वलित होना चाहती है। शरीर और मन वीर्य की उष्णता को साधारणतः अपने में समाहित नहीं रख पाता है। तेज प्रवाह के साथ वीर्य शरीर छोड़कर बाहर जाना चाहता है और शरीर भी उसे त्याग कर अपनी उत्तेजना को शान्त करना चाहता है। यह चाहना ही काम वासना है। और काम इच्छा को जिस विधि अथवा क्रीड़ा से पूर्णता प्रदान कर शान्त किया जाता है, उस क्रिया-विधि को काम कला कहते हैं। जिन शारीरिक अवयवों से युवा-युवता काम-क्रीड़ा करते हैं, उन्हें शिश्न और भग अथवा जननेन्द्रिय कहते हैं।

जब मन कामुक विचार अथवा प्रेमी की याद में प्रिय के साथ शारीरिक एकाकार की सर्वोच्च सीमा पर पहुँच कर पाँचों ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों के साथ जुड़ जाता है और बुद्धि विचारशून्य हो जाती है, तब काम क्रीड़ा जिस व्यायाम तथा मुद्रा से की जाती है, वही काम कला की विधि है। काम कला की एक विधि नहीं है। प्रेम की अवस्था, उत्तेजना की गति, मानसिक और शारीरिक ऊर्जा, दोनों पक्षों की रुचि, स्वीकारिता और वातावरण पर काम व्यायाम का चयन और प्रयोग निर्भर करता है। इसमें रति पूर्व क्रियाओं का विशेष महत्त्व है। काम वासना काम कला का कोई स्थायी विराम नहीं है। शान्त होते ही पुन: इच्छा जागृत हो जाती है। अत्यधिक सहवास, कामुक चिन्तन हानिकारक है।

काम क्रीड़ा पर अंकुश अति दुर्लभ है। यह केवल मन का संयम ही नहीं अपितु विचारों की सकारात्मकता पर बहुत कुछ निर्भर है। काम पिपासा शान्त करने के लिये सारथी का होना आवश्यक नहीं है। कामुक चिन्तन, विचारों में काम-क्रीड़ा तथा हस्तमैथुन जैसे कुटेव ब्रह्मचर्य भंग करते हैं। 

कामुक विचार, हस्तमैथुन, छिपकर या भय से या काम संवेग से वीर्य का नष्ट करना अथवा युवती का काम वासना शान्त करना अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म देता है 

निम्न बिन्दुओ पर अमल करके काम वासना को नियंत्रित किया जा सकता है 

1. कामजनित रोगों तथा अनावश्यक काम वासना रोकने के लिये प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाना चाहिये l 

2. सो कर उठते ही ॐ व गायत्री मंत्र का थोड़ी देर जप करके बिस्तर छोड़ देना चाहिये। 

कामवासना को कैसे शांत करें

3. बिस्तर से उठकर फ्रेश होने जायें और फिर दो या तीन गिलास सादा पानी पीयें। 

4. असहनीय कामेच्छा होने पर स्नान करना चाहिए l  

5. काम इच्छा हो तो एकान्तवास से बचना चाहिए परिवार के साथ समय बिताना चाहिए जिससे आपका ध्यान भटक जायेगा और काम वासना शांत हो जायेगी l 

6. ग्रस्तिका, अनुलोम-विलोम, कपालभांति, भ्रामरी, उद्गीथ तथा बाह्य प्राणायाम करें ।

7. धार्मिक पुस्तकों का नियमित स्वाध्याय करें। गंदा साहित्य न पढ़ें। कुसंग त्यागें। अच्छे व्यक्तियों की संगत में रहें। 

8. बैडरूम में पुरुष- नारी के तथा नारी-पुरुष के नग्न चित्रर नहीं लगायें। नग्न स्त्री या नग्न पुरुष का चित्र न चिपकाये l 

9. अधिक मिर्च, मसाला, खटाई वाला भोजन नहीं करें। माँस, अण्डा, मदिरा, तम्बाकू, धूम्रपान व अन्य नशों का त्याग करें।

10. मस्तिष्क को तनावमुक्त रखने का प्रयास करें। 

11. युवक-युवती एक-दूसरे के प्रति अच्छे सम्बोधन (भैया-बहिन आदि) का प्रयोग करें। हैलो, डियर, डार्लिंग आदि पाश्चात्य शब्दों का प्रयोग बन्द करें। आदर देना और आदर पाना स्वीकार करें। छिपकर कार्य करने की प्रवृत्ति त्यागें। 

12. ईश्वर से डरें। काम की पूर्ति धर्मानुकूल हो।अधर्म से बचें निश्चय ही काम का हर सूत्र गुणकारी और सर्व मंगलकारी होगा। प्रेरणादायक और आनन्ददायक होगा।

सुखी दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच सन्तुष्टिकारक सेक्स सम्बन्धों की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसीलिये ऐसे कार्य बिलकुल नहीं किये जाने चाहिये जिससे पुरुष की कामक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़े। बहुत व्यक्ति भ्रामक विचारधारा के अन्तर्गत कामशक्ति से बढ़ाने के लिये विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। यह वास्तविकता नहीं है, क्योंकि किसी प्रकार का नशा व्यक्ति को शारीरिक क्षमता को कम करने के साथ-साथ यौन क्षमता को भी प्रभावित करता है, इसलिये संयमित जीवन जीने का प्रयास करें।

सुखी जीवन जीने, सम्भोग शक्ति बढ़ाने तथा नियंत्रित करने के उपाय 

मनुष्य का स्वास्थ्य उसी के हाथ में होता है। वह चाहे तो कुछ स्वास्थ्य सूत्रों को समझ कर उनका पालन करते हुये जीवन भर स्वस्थ रह सकता है। ऐसे कौन से स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र हैं, इनके बारे में आप भी जानकर आप अपनी सम्भोग शक्ति बढ़ा सकते है और काम वासना पर काबू भी पाया जा सकता है l 

सुखी जीवन के मूलमंत्र

1. कोई पदार्थ यदि बहुत स्वादिष्ट और गुणकारी हो तो भी उसे अपनी पाचनशक्ति के अनुकूल मात्रा में ही खाना चाहिये। कम खाने में हानि नहीं पर ज्यादा खाने में गुणकारी पदार्थ भी हानिकारक हो जाता है। अल्पाहारी स जीवति के अनुसार जो कम खाता है अर्थात् अनुकूल मात्रा में ही खाता है, वही सुखी व स्वस्थ रहता है। अति करने से मीठी वस्तु भी कड़वी हो जाती है।

2. सोने से पहले मूत्र त्याग कर लेना, मीठा दूध पीना, दन्त-मंजन करके मुह साफ करना, हाथ-पैर धो लेना और उस दिन भर में किये हुए कामों पर विचार करने के बाद ईश्वर का ध्यान करते हुए सोना मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हितकारी होता है। खाते समय और सोते समय मन एकाग्र रखना चाहिये।

3. शोक करने से बचना चाहिये क्योंकि शोक करने से कोई लाभ नहीं होता। जो व्यक्ति विवेकशील और धैर्यवान होते हैं, वे मरे हुए का, नष्ट हुई वस्तु का और बीती हुई बातों का शोक नहीं करते क्योंकि शोक करने से न तो मरा हुआ जीवित हो सकता है, न नष्ट हो चुकी वस्तु पुनः प्राप्त हो सकती है और न गुजरी हुई बात वापिस लौट सकती है।

4. स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए इन पाँच नियमों का पालन करना चाहिए- खाया हुआ भोजन भली-भांति पच जाने पर ही भोजन करना l मल-मूत्र आदि वेगों को न रोकना, स्त्री-सहवास में अति न करना, क्रोध व वैर भाव न रखना तथा चिन्ता न करना।

5. खिलखिला कर हंसने से पाचन- शक्ति ठीक रहती है जबकि चिन्ता और तनाव से पाचनशक्ति निर्बल होती है। मुस्कराने से चेहरा अच्छा लगता है जबकि क्रोध करने से मुखाकृति वीभत्स दिखाई देती है। रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने से चेहरा खिला हुआ और आंखें रसीली बनी रहती हैं।

6. अगर कोई खराब आदत पड़ जाये या किसी भी गलत( शराब, धूम्रपान, नशीले पदार्थ) पदार्थ को लम्बे समय से सेवन करने की आदत बन चुकी हो, उसे धीरे-धीरे कम करते हुए छोड़ना चाहिये। एकदम से छोड़ देने से लाभ के बदले हानि होती है। धूम्रपान की आदत छोड़ने में यह नियम लागू नहीं होता।

7. क्रोधित अवस्था में कोई भी निर्णय करना अच्छा नहीं होता क्योंकि ऐसी अवस्था में विवेकपूर्ण कार्य नहीं किया जा सकता। जब बच्चे की मां के सिर पर क्रोध सवार हो तब बच्चे को दूध नहीं पिलाना चाहिये क्योंकि क्रोध के प्रभाव से उस वक्त मां का दूध दूषित रहता है जो बच्चों को रोगग्रस्त कर देता है।

8. अगर आप दिन भर बैठ कर काम करते हैं तो घड़ी भर घूमना फिरना या चहलकदमी करना (पैदल चलना) जरूरी है । यदि आप शारीरिक परिश्रम और दौड-धूप वाले काम करते हैं तो घड़ी भर विश्राम करना जरूरी है। तन्दुरुस्त बने रहने के लिए पैरों को ठण्ड से बचाकर गर्म रखें, माथे को गर्मी से बचा कर शान्त रखें और जरा भी कब्ज न रहने दें।
ऊपर लिखित सूत्रों को जीवन में अपनाकर न केवल आप स्वस्थ रहेंगे, अपितु जीवन का भरपूर आनन्द भी ले सकते हैं।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां