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अंकुरित गेहूं खाने के फायदे बताए - स्वास्थ्य पत्रिका

अंकुरित गेहूं खाने के फायदे के बारे में हम विस्तार से जाने लेकि उससे पहले जान लेते है कि गेहूँ क्या है?  कहाँ से आया है, इसके क्या उपयोग है l गेहूं से बड़े से बड़े असाध्य रोग ठीक हो जाते है l जैसे नपुंसकता, बांझपन, टीबी, शरीर कि हड्डिया जोड़ना, चर्म रोग, किडनी, पथरी और कैंसर जैसे असाध्य रोगों को समाप्त के देता है गेहूं बहुत ही प्रभाव करी है गेहूँ l अंकुरित गेहूँ के फायदे, गेहूं का पानी पीने के फायदे गेहूं का रस बनाने कि विधि तथा गेंहू को घर पर कैसे उगाया जाता है और उसे कैसे औषधि के रूप में प्रयोग किया जाये l 

अंकुरित गेहूँ खाने फायदे बताइये

गेहूं (Wheat) मध्य पूर्व क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व में मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाले फसल है, विश्व में गेहूँ की पैदावार में भारत दूसरे स्थान पर है l

गेहूं के दाने और दानों को पीस कर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबलरोटी (ब्रेड), कुकीज, केक, दलिया, पास्ता, रस, सिवईं, नूडल्स आदि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।  गेहूं की फसल का भूसा(शुक्ला) पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है और इसके अलावा छत/छप्पर तथा ईंट निर्माण के लिए रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है l 

गेहूँ को अंग्रेजी में (WHEAT) कहते है l गेहूँ का वैज्ञानिक लेटिन नाम- ट्रीटिकम एस्टिवम (Triticum acstivum) ट्रीटिकम वलगेरे(Triticum vulgare)ट्री टिकम ड्यूरम (Triticum durum) है l गेहूँ की रोटी अन्य अन्नों मे अच्छी होती है l 

हालांकि दुनिया भर मे आहार प्रोटीन और खाद्य आपूर्ति का अधिकांश गेहूं द्वारा पूरा किया जाता है, लेकिन गेहूं मे पाये जाने वाले एक प्रोटीन ग्लूटेन के कारण विश्व का 100 से 200 लोगों में से एक व्यक्ति पेट के रोगों से ग्रस्त है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की इस प्रोटीन के प्रति हुई प्रतिक्रिया का परिणाम है।

गेहूँ के औषधीय गुण, रोग तथा प्रयोग करने कि विधि क्या है? 

पेशाब के साथ बीर्य जाना - सौ ग्राम गेहूँ रात को पानी में भिगो दें। सवेरे उसी पानी में उन्हें पत्थर पर पीसकर लस्सी बना लें। स्वाद के लिए चीनी मिला लें। सात दिन पीने मे आराम हो जाता है। 

पागल कुत्ते के काटने की पहचान - गेहूँ के आटे को पानी में गूँदकर, औसन कर, उसकी कच्ची रोटी (बिना तवे पर सेके) कुत्ता काट स्थान पर रख कर बाध दें। थोड़़ी देर बाद उसी खोलकर किसी अन्य कत्ते के पास खाने के लिए डाल दें। यदि वह कुत्ता उस आटे को नहीं खाये  तो समझ सेना चाहिए कि पागल कत्ते ने काटा है। यदि खाले तो समझें कि वह पागल नहीं है 

दस्त, आमातिसार - सौंफ को पीसकर पानी में मिला कर, छान कर इस सौंफ के पानी में गेहं का आटा औसण कर रोटी बना कर खाने से लाभ होता है।

पाचक - गेहूँ का आटा रोटी बनाने हेतु पानी डाल कर औसण लें, घूँद लें तथा एक घंटा रखें और फिर इसकी रोटी बना कर खायें। यह रोटी शीघ्र पच जाती है। 

चोट - गेहं की राख, घी और गड़ तीनों समान मात्रा में मिला कर एक चम्मच सुबह-श दो बार खाने से चोट का दर्द ठीक हो जाता है।

सुजन - गेहूँ उबाल कर गर्म-गर्भ पानी से सूजन वाली जगह को धोने से सूजन कम दो जाती है।

हड्डी टूटने पर 12 ग्राम गेहूँ की राख इतने ही शहद में मिलाकर चाटने से टूटी हुई हड्डियाँ जुड़ जाती हैं। कमर और जोड़ों के दर्द में भी आराम होता है। सीरा बना कर खायें । इससे दर्द हड्डी टूटना, चोट, मोच लगने पर गुड़ में गेहूँ का हलवा, में लाभ होता है और हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है l 

कीड़े - गेहूँ के आटे में समान मात्रा में बोरिक एसिड पाउडर मिलाकर पानी डाल कर गोलियाँ बना लें और गेहू में रखें कीड़े, काक्रोच नहीं रहेंगे।

चर्म रोग- डॉ० के० के० पी० वर्मा, बिहार के अनुसार खर्रा, दुष्ट अकौता तथा दाद की तरह कठिन, गुप्त एवं सूखे चम रोगों में- गेहूँ को गर्म तवे पर खूब अच्छी तरह भून कर, जब वह बिल्कुल ही राख की तरह हो जाए तो उसे खूब अच्छी तरह पीस कर श्द्ध सरसों के तेल में मिलाकर सम्बन्धित स्थान पर लगाने से कई वर्षों के असाध्य एवं पराने चर्म रोग आरोग्य हुए हैं।
खुजली - गेहूँ के आटे में पानी मिलाकर लेप करने से चर्म की दाह, खुजली, टीस युक्त फोड़े, फन्सी और अग्नि से जले हुए पर लगाने से लाभ होता है ।

खौसी - गेहूं का पानी पीने खांसी में फायदा होता है l 20 ग्राम गेहूँ, 9 ग्राम सैंघे नमक की पाव भर पानी में औटाकर तिहाई पानी रहने पर छानकर पिलाने मे सात दिन में खाँमी मिट जाती है ।

पेशाब की जलन - रात को 12 ग्राम गेहूँ 250 ग्राम पानी में भिगो दें। प्रातः छान कर उसे पानी में 75 ग्राम मिश्री मिलाकर पीनें में पेशाब की जलन दूर होती है । 

पथरी - गेहूँ और चनों को औटाकर उनका पानी पिलाने मे गुर्दा और मूत्राशय की पथरी गल जाती है।

दर्द - गेहूँ की रोटी एक ओर सेक लें, एक ओर कच्ची रखें। कच्ची की ओर तिल का तेल लगा कर दर्द वाले अंग पर बाँध दें। इससे दर्द दर हो जायेगा।

नपुन्सकता, बाँझपन - आधा कप गेहूँ को बारह घण्टे पानी में भिगोयें, फिर गीले मोटे कपड़े में बाँध कर चौबीस घण्टे रखें। इस तरह छत्तीस घण्टे में अंकुर निकल आयेंगे। इन अंकरित गेहुँओं को बिना पकाये ही खायें। स्वाद के लिए गड या किशमिश मिलाकर खास सकते हैं। इन अंकुरित गेहुँओं में विटामिन ई (E) भरपूर मिलता है। यह स्वास्थ्य एवं शक्ति का भण्डार है। नपुंसकता एवं बाँझपन में यह लाभकारी है। केवल सन्तानोत्पत्ति के लिए 25 ग्राम अंकुरित गेहूँ तीन दिन और फिर तीन दिन इतने ही अंकरित उड़द पर्यायक्रम से खाने चाहिए। यह प्रयोग कुछ महीने करें। गेहूँ के अंकुर अमृत हैं। इनमें शरीर की रक्षा के लिए आवश्यक सभी विटामिन प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। गेहँ के अंकुर खाने से सभी रोग दूर हो जाते हैं।

गेहूँ के पौधे में रोगनाशक ईश्वर प्रदत्त अपूर्व गुण पाये जाते है l

गेहूं के औषधीय गुण

गेहूँ के पौधे में शरीर का शोधन करने और उसे स्वस्थ रखने की अद्भुत शक्ति है। अमेरीका की एक महिला डॉक्टर ने गेहूँ की शक्ति के सम्बन्ध में बहुत अनुसंधान तथा अनेकानेक प्रयोग करके एक बड़ी पुस्तक लिखी है, जिस का नाम है" Why suffer? The Answer? Wheat Grass Manna!" इसकी लेखिका हैं, विख्यात प्राकृतिक चिकित्सक डॉ.एन.विगमोर D.D.N.D.: P.S.D. 3B P.W.D.; S.M.D. इत्यादि। 

पुस्तक में उन्होंने अपने सब अनुसंधानों का पूरा विवरण दिया है। उन्होंने अनेकानेक असाध्य रोगियों को गेहूँ के आटे के छोटे-छोटे पौधों का रम (Wheat Grass Juice) देकर उनके कठिन से कठिन रोग अच्छे किए हैं। 

वे कहती हैं कि संसार में ऐसा कोई रोग नहीं है जो इस रस के सेवन करने से अच्छा न हो सके। कैंसर के बड़े-बड़े भयंकर रोगियों को उन्होंने अच्छा किया है, जिन्हें डॉक्टरों ने असाध्य समझकर जबाव दे दिया था l अस्पताल से निकाल दिये गये थे। गेमी हितकर चीज यह अदभुत (Wheat Grass Juice) साबित हुई है। 

अनेकानेक भगंदर, बवामीर, मधुमेह, गठियावाय पीलियाज्वर, दमा, खाँनी वगैरह के पुराने असाध्य रोगी उन्होंने इम साधारण रस से अच्छे किये हैं। बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने में तो यह गामबाण ही हैं। 

भयंकर फोड़ों और घावों पर इमकी लगदी बाँधने से जल्दी लाभ होता है। अमेरिका के अनेकानेक बड़े-बड़े डॉक्टरों ने इस बात का समर्थन किया है और अब बम्बई व गुजरात प्रान्त में भी अनेक लोग इसका प्रयोग करके लाभ उठा रहे हैं ।

गहूँ के पौधे का महत्त्व - भारत में आयोजित विश्व शाकाहारी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए डॉ. विगमोर आई। हमारे प्रश्न किए जाने पर कि गेहूँ के पौधे के रस के पीछे क्या सिद्धान्त हैं? 

डॉ० विगमोर ने कहा कि सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि बीमारी क्या है? हममें से अधिकांश लोग अनुचित खाद्य वस्तुओं और खाने के अनुचित तरीकों के द्वारा जीवन भर अपने शरीर का दुरूपयोग करते रहते हैं। इस दुरुपयोग के कारण हमारे शरीर में सब प्रकार का विष जमा हो जाता है। 

गेहूँ के पौधे के गुणों पर प्रकाश डालते हुए डॉ० विगमोर ने कहा कि गेहूँ के पौधे में सर्वाधिक पोषक तत्त्व हैं। गेहूँ के पौधे में जीवनदायी तत्त्व सबसे अधिक हैं । रासायनिक शोध से ज्ञात हुआ है कि गेहूँ के पौधे का रस हमारे रक्त से बहुत मिलता- जुलता है। गेहूँ के पौधे में मेगनेशियम अणु है, जबकि हमारे रक्त में लोहा इस विशेषता के कारण गेहूँ के पौधे का रस रक्त और नाड़ियों के शोधन में अत्यन्त उपयोगी है।

कैसर का उपचार - गेहूँ का पौधा कैँसर के उपचार में किस प्रकार सहायक है? डा० विगमोर ने कहा- कैंसर भी शरीर की एक स्थिति मात्र है, जो यह बताती है कि इस अद भुत यन्त्र में कहीं कोई खराबी है। प्रकृति सदा शरीर को सन्तुलन में रखने का प्रयत्न करती है।

कुछ लोग कैंसर से पीड़ित होते हैं और कुछ को अन्य बीमारियां, यह इसलिए कि सबके जीवन जीने का ढंग अलग अलग है। एक महिला की छाती में कैंसर था। सब प्रकार की चिकित्सा करा कर वह निराश हो चुकी थी। उसको सब प्रकार के रसों का आहार दिया गया और कुछ महीनों में वह ठीक हो गई। इसी प्रकार एक ल्यूकीमिया के मरीज को पानी का एनिमा देकर पेट साफ किया और बाद में एनिमा से ही आँतों में गेहूँ के पौधे का रस पहुँचाया और वह ठीक हो गया। नगरों में निरन्तर प्रदूषण बढ़ रहा है। गेहूँ के पौधे में प्रदूषण विरोधी तत्त्व हैं और इसके सेवन से कैंसर और अन्य रोगों से बचा जा सकता है।

इस रस को लोग Green Blood की उपमा देते हैं। कहते हैं कि यह रस मनुष्य के रक्त से 40 फीसदी मेल खाता है। ऐसी अद्भुत औषधि आज तक कहीं देखने में नहीं आयी थी। इसके तैयार करने की विधि बहुत ही सरल है। प्रत्येक मनुष्य घर में इसे आसानी से तैयार कर सकता है।

रस बनाने की विधि - आप 10 -12 चीड़ के टूटे -फटे बक्सों में, बाँस की टोकरी में अथवा मिट्टी के गमलों में मिट्टी भर कर उसमें प्रतिदिन बारी-बारी से आधी मुट्ठी उत्तम गेहूँ के दाने बो दीजिए और छाया में अथवा कमरे या बरामदे में रख कर यदाकदा थोड़ा-थोडा पानी डालते जाइये, धूप न लगे तो अच्छा है। जिस मिट्टी में गेहू बोया जाय उसमें अधिक खाद नहीं होना चाहिए। तीन चार दिन बाद पौधे उग आयेंगे और आठ-टस दिन में 7-8 इंच के हो जायेंगे l 

तब आप उसमें से पहले दिन बोए हुए सारे पौधे जड़ सहित उखाड़कर जड़ को काट कर फेंक दीजिए और बचे हुए डण्टठल और पत्ती को (जिसे Wheat' Grass कहते हैं) धोकर साफ मिल पर थोड़े पानी के साथ पीसकर आधे गिलास के लगभग रस छानकर तैयार कर लीजिए और रोगी को तत्काल वह ताजा रस  रोज सुबह सुबह भूके पेट पिला दीजिए l इसी प्रकार शाम को भी ताजा रस तैयार करके पिलाइये। फिर दो घटे तक कछ नहीं खायें भोजन सादा, बिना तला भुना ले। 

आप देखेंगे कि भयंकर रोग आठ-दस या पन्द्रह-बीस दिन बाद भागने लगेंगे और दो-तीन महीने में वह मरणप्रायः प्राणी एकदम रोग मुक्त होकर पहले के समान हट्टा-कट्टा स्वस्थ मनुष्य हो जायेगा। रस छानने में जो बचा हुआ निकले उसे भी आप नमक डालकर भोजन के साथ खालें तो बहुत अच्छा है। रस निकालने के झंझट में बचना चाहते है तो आप उन पौधों को चाकू से महीन-महीन काट कर भोजन के साथ सलाद की तरह भी सेवन कर सकते हैं, परन्त उसके साथ कोई फल न मिलाये जायें। माग-मब्जी मिलाकर खूब शौक से खाइये।

गेहूँ के पौधे 7-8 इंच से ज्यादा बड़े न होने पायें, तभी उन्हें काम में लाया जाये l  इसी कारण 10-12 गमले या चींड़ के बक्से रखकर बारी-बारी (प्रायः प्रतिदिन दौ-गएक गमलों में) आपको गेहूँ के दाने बोने होंगे l  जैसे - जैसे गमले खाली होते जायें, वैसे-वैसे उनमें गेहूँ बोते चले जाइये। इस प्रकार 12 महीना गमलो में गेहूँ उगाया जा सकता है। 

उक्त महिला डाक्टर ने अपनी प्रयोगशाला में हजारों रेगियों पर इस wheat Grass Juice का प्रयोग किया है और इसका कारण यह है कि उसमें से किसी एक मामले में भी असफलता नहीं हुई। रस निकालकर ज्यादा देर नहीं रखना चाहिए। ताजा ही सेवन कर लेना चाहिए। घण्टा दो घण्टा खकर छोड़ने मे उसकी शक्ति घट जाती है और तीन-चार घण्टे वाट तो वह बिल्कल व्यर्थ हो जाता है। डण्ठल और पत्ते इतनी जल्दीं खराब नहीं होते। वे गमलों में हिफाजत में रखे जायें तो विशेष हानि नहीं पहुँच सकती है। 

इसके साथ-साथ आप एक काम और कर सकते हैं। वह यह है कि आप आधा कप गेहूँ लेकर धो लीजिए और किमी बर्तन में डालकर उसमें दो कप पानी भर दीजिए बारह घण्टे बाट वह पानी निकाल कर आप सुबह, शाम पी लीजिए। वह आपके रोग की निर्मुल करते में अधिक सहायता करेगा। बचे गेहूँ आप नमक और मिर्च डाल कर वैसे भी खा सकते हैं, अथवा पीसकर हलआ बनाकर सेवन कर सकते हैं अथवा सुखाकर आटा पिसवा सकते हैं। सब प्रकार लाभ-ही -लाभ है।

 यह गेहूँ के पौधों में भरा हुआ ईश्वर प्रदेत्त अमृत! 

इस अमृत का सेवन कर स्वयं सुखी हों और लाभ मालूम हो तो परोंपकार के विचार मे इसका यथाशक्ति प्रचार करके अन्य लोगों का कल्याण करें और महान पुण्य के भागी हों। गेहँ के पौधे का रस पीने से बाल भी कछ समय के बाद काले हो जाते हैं। शरीर में तो ताकत बढती है मुत्राशय की पथरी भी ठीक हो जाती है । भूख खूब लगती है। आँखों की ज्योति बढ़ती है । विद्यार्थियों का शारीरिक व मानमिक विकास खुब होता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है। छोटे बच्चों को भी यह रस दिया जा सकता है। छोटे बच्चा को पाँच - पाँच बूँद देना चाहिए। 

रस धीरे-धीरे घूँट-घूँट पीना चाहिए। रस बनने पर तुरन्त पी लेना चाहिए। तीन घण्टे में उसके पोषक गुण दूर हो जाते हैं। रस लेने के पूर्व तथा बाद में एक घण्टे तक कुछ भी न खाया जाये। शुरू में कइयों को उलटी होगी और दस्त होने लगेंगे तथा सर्दी मालूम पड़ेगी। यह सब रोग होने की निशानी है। सर्दी, उलटी या दस्त से शरीर में एकत्रित मल बाहर निकल जायेगा, इससे घबराने की जरूरत नहीं है। रस में अदरक अथवा खाने का पान मिला सकते हैं। इससे स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है। रस मे नींबू अथवा नमक नहीं मिलाना चाहिए l
गेहूँ घास रस के फायदे
यह रस लेने वालों का अनुभव है कि इससे आँखें, दाँत और बालों को बहुत फायदा होता है। और कब्ज़ नहीं रहती। इस रस के सेवन से कोई हानि नहीं होती l इसका सेवने करते समय सादा भोजन ही लेना चाहिए। तली हुई वस्तुयें नहीं खानी चाहिए।

गेहूँ घास-रस के अन्य साभः-

1. संभव हो तो गेहूँ-घास-रस का 'एनिमा' भी लें। इससे पेट में यदि कीड़े हों तो बाहर निकल आते हैं। पेट साफ रहता है तथा पेट से उठने वाली अन्य बीमारियों में भी फायदेमंद है । जैसे कब्ज, गैस, ट्रबल, अल्सर आदि ।

2. भूख खूब लगती है तथा शारीरिक शक्ति में अत्यधिक वृद्धि होती है व शुद्ध खून का निमार्ण होता है और चेहरा सुन्दर हो जाता है।

3. मूत्राशय व गुर्दे संबंधी रोग दूर होते हैं। पथरी भी दूर होती है। दाँत मजबूत होते है तथा बालों को भी लाभ होता है। आँखों की ज्योति बढ़ती है। चर्मरोग नहीं होते।

4. विद्यार्थियों का शारीरिक-मानसिक विकास खूब होता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है। नशे की आदत छूट जाती है।

5. ब्लड प्रेशर, हृदय-रोग, लकवा व पोलियो की सम्भावना नहीं रहती।।

6. गेहूं-घास की पत्तियों को पानी में डालकर रखने से उसके कीटाणु नष्ट होकर पत्तियों से चिपक जाते हैं व पानी अत्यधिक शुद्ध हो जाता है।

चोकर-काफी एक प्रयोग यह-भी: -

गेहूँ के आटे को मैदे की छलनी से छान लीजिए और जो चोकर यानी चापड़ या भूरी निकले उसे तवे पर सेंक लें। उसे इतना सेकें कि वह लाल हो जावे परन्तु कच्ची न रहे और जले भी नहीं। फिर इस सिकी हुई चोकर को दूध -शक्कर पानी में डालकर खूब उबाले और छानकर पीयें इसका स्वाद कॉफी के सामान होगा और तुरन्त स्फूर्ति मालूम होगी क्योंकि इसमें प्रोटीन अधिक है। इससे 'ब्लड-प्रेशर', हार्ट- अटेक, कब्ज व गेस में फायम होगा और शारीरिक कमजोरी दूर करने में तो इसका कोई जवाब ही नहीं।
निरोगता - गेहूँ का शर्बत शारीरिक स्फूर्ति और शक्ति देता है। फार्म का गेहू एक बर्तन में डालें और इससे दुगना पानी डाल कर बारह घण्टे तक भीगने दें। फिर इसे छानकर पानी शहद मिलाकर पीयें इस प्रकार गेहूँ का पानी नित्य पीने से कोई रोग पास नहीं आयेगा l जिन्हें लाभ पहुँचे वे लेखक को अपने अनुभव लिखकर भेंजे ताकि दूसरों को बताया जा सके।

निष्कर्ष - जैसे कि  हमने देखा गेहूँ अनेक प्रकार के गंभीर असाध्य रोगों को इलाज में अंकुरित गेहूँ कारगर साबित हुआ है जिसमे मुख्य रोग कैंसर, मधुमेह, ब्लड प्रेशर, बांझपन, नपुंसकता इत्यादि रोगों को ठीक करने में सक्षम रहा है गेहूँ l इसके अलावा गेहूं को गमले में उगाने की विधि इस्तेमाल करने की विधि, कैंसर का उपचार गेहूँ का तस निकलने की विधि के साथ अंकुरित गेहूँ के फायदे के बारे में बताया है  

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